खुद की राह खुद बना
जिंदगी की उलझन के हासिये में कितने खो गए
जो है बाक़ी यहाँ खुदगर्ज़ हो गए
खुद के लिए फूल दूजे के शूल हो गए
खुद की राह खुद बना
कोई चाह ऐसी न रही फकत
जो थे मेरे साथ तेरे हो गए
संबधो की डोरी किसी टूटे कब
टूटी है । वो फिर गुनहगार से मेरे हो गए
खुद की रह खुद बना
आया है माझी पतवार के लिए
धाराओ के विपरीत साँसों के
तार हो गए
अब तू ही लगा पार अनंत
रिश्तो के काफिले उजाड़ हो गए
खुद बना ........
दीपेश कुमार
स्वरचित कविताओं/विचारो/लेखों/ज्ञानवर्धक संग्रह/कहानियां **न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।* *कामये दुःखतप्तानां प्रणिनां आर्तिनाशनम् ॥*
Saturday, September 15, 2018
कविता 17
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