Thursday, July 16, 2020

संज्ञा व्यकारण दीपेश कुमार जैन tgt हिंदी jnv wrs

संज्ञा(Noun)की परिभाषा

संज्ञा उस विकारी शब्द को कहते है, जिससे किसी विशेष वस्तु, भाव और जीव के नाम का बोध हो, उसे संज्ञा कहते है।
दूसरे शब्दों में- किसी प्राणी, वस्तु, स्थान, गुण या भाव के नाम को संज्ञा कहते है।

जैसे- प्राणियों के नाम- मोर, घोड़ा, अनिल, किरण, जवाहरलाल नेहरू आदि।

वस्तुओ के नाम- अनार, रेडियो, किताब, सन्दूक, आदि।

स्थानों के नाम- कुतुबमीनार, नगर, भारत, मेरठ आदि

भावों के नाम- वीरता, बुढ़ापा, मिठास आदि

यहाँ 'वस्तु' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है, जो केवल वाणी और पदार्थ का वाचक नहीं, वरन उनके धर्मो का भी सूचक है।
साधारण अर्थ में 'वस्तु' का प्रयोग इस अर्थ में नहीं होता। अतः वस्तु के अन्तर्गत प्राणी, पदार्थ और धर्म आते हैं। इन्हीं के आधार पर संज्ञा के भेद किये गये हैं।

संज्ञा के भेद

संज्ञा के पाँच भेद होते है-
(1)व्यक्तिवाचक (Proper noun )
(2)जातिवाचक (Common noun)
(3)भाववाचक (Abstract noun)
(4)समूहवाचक (Collective noun)
(5)द्रव्यवाचक (Material noun)

(1)व्यक्तिवाचक संज्ञा:-जिस शब्द से किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु या स्थान के नाम का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।

जैसे-
व्यक्ति का नाम-रवीना, सोनिया गाँधी, श्याम, हरि, सुरेश, सचिन आदि।

वस्तु का नाम- कार, टाटा चाय, कुरान, गीता रामायण आदि।

स्थान का नाम-ताजमहल, कुतुबमीनार, जयपुर आदि।

दिशाओं के नाम- उत्तर, पश्र्चिम, दक्षिण, पूर्व।

देशों के नाम- भारत, जापान, अमेरिका, पाकिस्तान, बर्मा।

राष्ट्रीय जातियों के नाम- भारतीय, रूसी, अमेरिकी।

समुद्रों के नाम- काला सागर, भूमध्य सागर, हिन्द महासागर, प्रशान्त महासागर।

नदियों के नाम- गंगा, ब्रह्मपुत्र, बोल्गा, कृष्णा, कावेरी, सिन्धु।

पर्वतों के नाम- हिमालय, विन्ध्याचल, अलकनन्दा, कराकोरम।

नगरों, चौकों और सड़कों के नाम- वाराणसी, गया, चाँदनी चौक, हरिसन रोड, अशोक मार्ग।

पुस्तकों तथा समाचारपत्रों के नाम- रामचरितमानस, ऋग्वेद, धर्मयुग, इण्डियन नेशन, आर्यावर्त।

ऐतिहासिक युद्धों और घटनाओं के नाम- पानीपत की पहली लड़ाई, सिपाही-विद्रोह, अक्तूबर-क्रान्ति।

दिनों, महीनों के नाम- मई, अक्तूबर, जुलाई, सोमवार, मंगलवार।

त्योहारों, उत्सवों के नाम- होली, दीवाली, रक्षाबन्धन, विजयादशमी।

(2) जातिवाचक संज्ञा :- जिस शब्द से एक जाति के सभी प्राणियों अथवा वस्तुओं का बोध हो, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।

बच्चा, जानवर, नदी, अध्यापक, बाजार, गली, पहाड़, खिड़की, स्कूटर आदि शब्द एक ही प्रकार प्राणी, वस्तु और स्थान का बोध करा रहे हैं। इसलिए ये 'जातिवाचक संज्ञा' हैं।

जैसे- लड़का, पशु-पक्षयों, वस्तु, नदी, मनुष्य, पहाड़ आदि।

'लड़का' से राजेश, सतीश, दिनेश आदि सभी 'लड़कों का बोध होता है।

'पशु-पक्षयों' से गाय, घोड़ा, कुत्ता आदि सभी जाति का बोध होता है।

'वस्तु' से मकान कुर्सी, पुस्तक, कलम आदि का बोध होता है।

'नदी' से गंगा यमुना, कावेरी आदि सभी नदियों का बोध होता है।

'मनुष्य' कहने से संसार की मनुष्य-जाति का बोध होता है।

'पहाड़' कहने से संसार के सभी पहाड़ों का बोध होता हैं।

(3)भाववाचक संज्ञा :-थकान, मिठास, बुढ़ापा, गरीबी, आजादी, हँसी, चढ़ाई, साहस, वीरता आदि शब्द-भाव, गुण, अवस्था तथा क्रिया के व्यापार का बोध करा रहे हैं। इसलिए ये 'भाववाचक संज्ञाएँ' हैं।

इस प्रकार-

जिन शब्दों से किसी प्राणी या पदार्थ के गुण, भाव, स्वभाव या अवस्था का बोध होता है, उन्हें भाववाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे- उत्साह, ईमानदारी, बचपन, आदि । इन उदाहरणों में 'उत्साह' से मन का भाव है। 'ईमानदारी' से गुण का बोध होता है। 'बचपन' जीवन की एक अवस्था या दशा को बताता है। अतः उत्साह, ईमानदारी, बचपन, आदि शब्द भाववाचक संज्ञाए हैं।

हर पदार्थ का धर्म होता है। पानी में शीतलता, आग में गर्मी, मनुष्य में देवत्व और पशुत्व इत्यादि का होना आवश्यक है। पदार्थ का गुण या धर्म पदार्थ से अलग नहीं रह सकता। घोड़ा है, तो उसमे बल है, वेग है और आकार भी है। व्यक्तिवाचक संज्ञा की तरह भाववाचक संज्ञा से भी किसी एक ही भाव का बोध होता है। 'धर्म, गुण, अर्थ' और 'भाव' प्रायः पर्यायवाची शब्द हैं। इस संज्ञा का अनुभव हमारी इन्द्रियों को होता है और प्रायः इसका बहुवचन नहीं होता।

भाववाचक संज्ञाएँ बनाना

भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण जातिवाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, सर्वनाम और अव्यय शब्दों से बनती हैं। भाववाचक संज्ञा बनाते समय शब्दों के अंत में प्रायः पन, त्व, ता आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

(1) जातिवाचक संज्ञा से भाववाचक संज्ञा बनाना

जातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञााजातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञाा
स्त्री-स्त्रीत्वभाई-भाईचारा
मनुष्य-मनुष्यतापुरुष-पुरुषत्व, पौरुष
शास्त्र-शास्त्रीयताजाति-जातीयता
पशु-पशुताबच्चा-बचपन
दनुज-दनुजतानारी-नारीत्व
पात्र-पात्रताबूढा-बुढ़ापा
लड़का-लड़कपनमित्र-मित्रता
दास-दासत्वपण्डित-पण्डिताई
अध्यापक-अध्यापनसेवक-सेवा

कोरोना भी क्या चीज़ है पापा

कोरोना भी क्या चीज है पापा
 हर गली पसरा खोफ का कांटा
 जिधर  देखो  हो  गया सन्नाटा
 एक अनदेखा शत्रु देता है झाँसा
 बंद हो गया सारे जग का सैर सपाटा
          कोरोना भी क्या चीज है पापा
  मंदिर मस्जिद ने कर लिए द्वार बंद
  मनुष्य अब जाए  कहा कहने  द्वंद
  देश -विदेश  सब  एक  समान हुए
  करुण आंखों में बचे आंसू भी चंद
          कोरोना भी क्या चीज है पापा
 भय,दहशत से कोई नही रहा अछूता
 घर, बाहर,द्वार सब डर डर के  छूता
 देश दुनिया सब हुए जा रहे त्राह त्राह
 मानवता खोज रही फिर कोई  गीता
          कोरोना भी क्या चीज है पापा
संकट में दिखावटी हास्यविनोद होता
फिर देखकर जखीरा लाशो का  रोता
सब ज्ञान, मान  ,सम्मान  धूमिल हुए
हर दिन सोचकर बचे रहे रोज जीता
            दीपेश कुमार जैन
       जवाहर नवोदय विद्यालय        
               वारासिवनी
          
  
 
 
  
          
  
  
  
  
  
 

मुक्तक दूरियां

कैसी होती   जा रही  दुनिया
सब ज्ञान विज्ञान हो गया धुंआ
कमरों में  सिमिट गया इंसान
सबसे  कीमती हो गई दूरियां
                          दीपेश जैन

नमक क्लास 12 दीपेश कुमार जैन

रज़िया सज्जाद ज़हीर कहानी नमक Razia Sajjad Zaheer kahani Namak class 12

रज़िया सज्जाद ज़हीर/नमक/ 1
आज हम अध्ययनचर्चा में ले रहे हैं, रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी ‘नमक’
इसके पहले हम विष्णु खरे का आलेख ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ की अध्ययन चर्चा कर चुके हैं।
कहानी ‘नमक’ का सारांश
सफिया एक दिन कीर्तन में गयी तो वहां पर उसने एक सिख बीबी को देखा। उन सिख बीबी को देखकर साफिया हैरान रह गई थी, किस कदर वह उसकी माँ से मिलती थी। जब साफिया ने कई बार उनकी तरफ मुहब्बत से देखा तो उन्होंने भी उसके बारे में घर की बहू से पूछा। उन्हें बताया गया कि ये मुसलमान हैं। कल ही सुबह लाहौर जा रही हैं।
लाहौर का नाम सुनकर वे उठकर साफिया के पास आ बैठीं और उसे बताने लगीं कि उनका लाहौर कितना प्यारा शहर है। बाद में कहा कि वहां से ‘‘अगर ला सको तो थोड़ा सा लाहौरी नमक लाना।’’
इस तरह हम देखते हैं कि यह भारत और पाकिस्तान के विभाजन की अत्यंत मार्मिक कहानी है। इसमें सरहद के इस पार और उस पार के लोगों के दर्द और भावनाओं का इज़हार हुआ है। पाकिस्तान से विस्थापित होकर आने वाली सिक्ख बीबी आज भी लाहौर को ही अपना वतन मानती है। वह उपहार के रूप में वहां के नमक की फ़रमाईश करती है।
पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी, गै़रकानूनी होते हुए भी, नमक ले जाने की इज़ाजत देते समय देहली को अपना वतन बताता है।
इसी प्रकार भारतीय कस्टम अधिकारी सुनील दासगुप्त कहता है कि ‘‘मेरा वतन ढाका है। राष्ट्र-राज्यों की नयी सीमा रेखाएं खींची जा चुकी हैं और मजहबी आधार पर लोग इन रेखाओं के इधर-उधर अपनी अपनी जगहें मुकर्रर कर चुके हैं, इसके बावजूद ज़मीन पर खींची गयी रेखाएं अंतर्मन तक नहीं पहुंच पायीं हैं।’’
लाहौर के कस्टम अधिकारी का यह कथन भी गौरतलब है कि ‘‘उनको यह नमक देते वक़्त मेरी तरफ से कहियेगा कि लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा, तो बाकी सब रफ़्ता-रफ़्ता ठीक हो जायेगा।’’
इस तरह यह कहानी भौगोलिक रूप से दो भागों में बंट गये देश के लागों की भावनात्मक एकता की मार्मिक कहानी है। तो यह था ‘नमक’ कहानी का सारांश।
और अब इस कहानी से लिये गये गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर।
गद्यांश
जब डिवीजन हुआ तभी आये, मगर हमारा वतन ढाका है, मैं तो कोई बारह-तेरह साल का था। पर नजरूल और टैगोर साहब को तो हम लोग बचपन से पढ़ते थे। जिस दिन हम रात में यहां आ रहे थे, उसके ठीक एक वर्ष पहले मेरे सबसे पुराने, सबसे प्यारे बचपन के दोस्त ने मुझे यह किताब दी थी। उस दिन मेरी सालगिरह थी-फिर हम कलकत्ता रहे, पढ़े, नौकरी भी मिल गयी, पर हम वतन आते-जाते थे।
प्रश्न : 1 : यह कथन किसने किससे कहा है?
उत्तर : यह कथन सुनील दासगुप्त नाम के कस्टम अफसर ने सफिया से कहा हैं।
प्रश्न : 2 : डिवीजन शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर : डिवीजन शब्द का अर्थ है, विभाजन। यहां वह भारत-पाक विभाजन के बारे में प्रयुक्त हुआ है।
प्रश्न : 3 : नजरूल और टैगोर किनके नाम हैं?
उत्तर : नजरुलइसलाम और रवींद्रनाथ टैगोर बंगला भाषा के दो महान् कवियों के नाम हैं। पर अब एक बांग्लादेश के और दूसरे भारत के कवि कहे जाते हैं। विभाजन से पहले वे एक ही देश के थे।
प्रश्न : 4 : सुनील दासगुप्त का वतन कौन सा था?
उत्तर : सुनील दासगुप्त का वतन ढाका था।
तो यह था रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी ‘नमक’ पर आधारित गद्यांश के प्रश्नोत्तरों वाला हिस्सा।
प्रश्न : 1 : सफ़िया के भाई ने नमक की पुड़िया ले जाने से क्यों मना कर दिया?
उत्तरः- सफ़िया के भाई ने नमक की पुड़िया ले जाने से जिन कारणों से मना कर दिया था, वे इस प्रकार हैं –
1. पाकिस्तान से नमक ले जाना गै़रकानूनी है।
2. उसके अनुसार भारत के हिस्से में पहले ही बहुत सारा नमक आया हुआ है।
3. कस्टम अधिकारी पकड़ सकते हैं।
4. इससे हमारी भी बदनामी होगी।
प्रश्न : 2 : नमक की पुड़िया ले जाने के संबंध में सफ़िया के मन में क्या द्वंद्व था?
उत्तर : नमक की पुड़िया ले जाने के संबंध में सफ़िया के मन में यह द्वंद्व था, कि प्यार के तोहफे के तौर पर ले जायी जाने वाली नमक की उस पुड़िया को चोरी-छिपे ले जाए या फिर कस्टम अधिकारियों को जानकारी देकर।
प्रश्न : 3 : जब सफ़िया अमृतसर पुल पर चढ़ रही थी तो कस्टम ऑफिसर निचली सीढ़ी के पास सिर झुकाए चुपचाप क्यों खड़े थे?
उत्तर : जब सफ़िया अमृतसर पुल पर चढ़ रही थी, तो कस्टम ऑफिसर निचली सीढ़ी के पास सिर झुकाए चुपचाप इसलिये खड़े थे, क्योंकि वे वतन के प्रति सफिया का ऐसा प्रेम देखकर भावुक हो गये थे।
कानून तो उन्होंने ग़लत सहयोग किया था, परंतु इंसानियत के पक्ष में बड़ा काम किया था। इंसानियत कानूनों से बड़ी होती है। खुद वे भी अपने वतन की यादों में खोये हुए थे और मनुष्यता की व्यापक तथा उदार भावनाओं से आकंठ भरे हुए थे।
प्रश्न : 4 : ‘लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा या मेरा वतन ढाका है’ जैसे उद्गार किस सामाजिक यथार्थ का संकेत करते हैं।
उत्तर : ‘लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा या मेरा वतन ढाका है’ जैसे उद्गार मनुष्यता के इस सत्य को तथा इस सामाजिक यथार्थ की ओर संकेत करते हैं कि देश की सीमाएँ मनों को विभाजित नहीं कर सकतीं। राजनैतिक तौर पर भले ही हम विस्थापित हो जातें हैं परंतु भावनात्मक लगाव तो अपनी मातृभूमि से आजीवन बना रहता है।
प्रश्न : 5 : नमक ले जाने के बारे में सफ़िया के मन में उठे द्वंद्वों के आधार पर उसकी चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट
कीजिए।
1. भावुक महिला – वह मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाली-सफ़िया एक भावनाशील महिला है। वह सिख बीबी की भावनाओं की कद्र करती है, इसलिए वह किसी भी तरह उनके लिए लाहौरी नमक को भारत ले जाना चाहती है।
2. सत्य आचरण युक्त महिला – वह प्रेम की इस भेंट को चोरी से नहीं ले जाना चाहती। वह तय करती है कि कस्टम अधिकारियों को अपनी मानवीय भावनाओं को समझायेगी और उन्हें इंसानियत के कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करेगी।
3. जोखम उठाने को तत्पर महिला – पाकिस्तान से नमक को भारत ले जाना गैरकानूनी होने पर भी वह जानती थी कि एक सेर नमक कोई व्यापार करने के लिये चोरी से नहीं ले जाया जा रहा है, उसके पीछे वतन से प्यार करने की महान भावना है। इसके लिये वह जोखम उठाने के लिये भी तत्पर रहती है।
4. इंसानियत पर विश्वास करने वाली महिला : सफिया जब नमक को कस्टम अधिकारियों को बताकर ले जाने का निष्चय करती है, तो परोक्ष रूप से वह इंसानियत की भावना पर ही अपना विश्वास व्यक्त करती है। उसे भरोसा है कि जब वह कस्टम अधिकारी को सत्य से परिचित करायेगी, तो वे उसका सहयोग करेंगे।
5. वादा निभाने वाली महिला- वह अपने वादे या वचन को निभाने में जरा सी भी कोताही नहीं करती।
प्रश्न : 6 : ‘मानचित्र पर एक लकीर खींच देने भर से ज़मीन और जनता बँट नहीं जाती है’- उचित तर्कों व उदाहरणों के जरिए इसकी पुष्टि करें।
उत्तर : ‘मानचित्र पर एक लकीर खींच देने भर से ज़मीन और जनता बँट नहीं जाती है’, यह कथन एक परम सत्य है। भौगोलिक विभाजन भावनात्मक विभाजन नहीं बन सकता। इसीलिये पाकिस्तानी और भारतीय अधिकारी और सिख बीबी क्रमशः देहली, ढाका और लाहौर को ही आज भी अपना वतन मानते हैं।
वे अपने वतन की सामान्य चीजों से अमिट लगाव रखते हैं। इसी वजह से सिख बीबी ‘नमक’ जैसी साधारण चीज वहाँ से लाने का इसरार करती है।
प्रश्न : 7 : नमक कहानी में भारत व पाक की जनता के आरोपित भेदभावों के बीच मुहब्बत का नमकीन स्वाद घुला हुआ है, कैसे?
उत्तर : भले ही राजनीतिक कारणों से भारत और पाकिस्तान को भौगोलिक रूप से विभाजित कर दिया गया है, लेकिन दोनों देशों के लोगों के हृदय में आज भी पारस्परिक भाईचारा, सौहार्द्र, स्नेह और सहानुभूति विद्यमान है। जो लोग राजनैतिक और स्वार्थी होते हैं, वही दोनों देशों के नागरिकों में बैर होने की बात का प्रचार करते हैं और उसका फायदा उठाते हैं।
पर यह कहानी उस सत्य का उद्घाटन करती है, और जो वास्तविकता का चेहरा भी दिखाती है तथा प्रेम की भावना को भी सामने लाती है। इसी प्रेम के कारण अमृतसर में रहने वाली सिख बीबी लाहौर को अपना वतन कहती है और लाहौरी नमक का स्वाद नहीं भुला पाती।
पाकिस्तान का कस्टम अधिकारी नमक की पुड़िया सफ़िया को वापस देते हुए कहता है “जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहना।”
भारतीय सीमा पर तैनात कस्टम अधिकारी ढाका की ज़मीन को और वहाँ के पानी के स्वाद को नहीं भूल पाता। लिहाजा यही कहा जायेगा कि राजनीतिक तौर पर भले ही बंटवारा हो गया हो, पर सामाजिक तौर पर दोनों देशों की जनता के बीच मुहब्बत का नमकीन स्वाद घुला हुआ है।
प्रश्न : 8 : क्यों कहा गया?
1. ‘क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं, कुछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत, इंसानियत के नहीं होते?’
उत्तर : ऐसा इसलिये कहा गया है, क्योंकि कानून मनुष्य द्वारा निर्मित होते हैं और उन्हें आदमी की सुविधा के लिये ही बनाया जाता है, न कि असुविधा के लिये। पर मुहब्बत और इंसानियत के कानून हजारों सालों की सभ्यता और हृदय से निर्मित होते हैं। उनकी जगह आम कानूनों से कहीं ऊंची होती है।
2. भावना के स्थान पर बुद्धि धीरे-धीरे उस पर हावी हो रही थी।
उत्तर : ऐसा इसलिये कहा गया है, क्योंकि भावनाओं में अभिभूत होने के कारण सफ़िया अपने भाई से तर्क-वितर्क कर रही थी, परंतु जब सफ़िया का भावनात्मक गुस्सा उतर गया, तब वह नमक ले जाने के विषय में विवेकपूर्ण तरीके से सोचने लगी।
3. मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।
उत्तर : ऐसा इसलिये कहा गया है, क्योंकि प्रेम तो हृदयों में होता है, और उसे कोई मशीन नहीं पकड़ पाती। उस पर कोई कानूनी बंधन नहीं चलता।
4. हमारी ज़मीन हमारे पानी का मजा ही कुछ और है!
उत्तर : ऐसा इसलिये कहा गया है, क्योंकि भारतीय कस्टम अधिकारी भी अपने वतन और वतन की चीजों से उतनी ही मुहब्बत करता है, जितनी की कोई और।
प्रश्न : 9 : समझाइए तो जरा
1. फिर पलकों से कुछ सितारे टूटकर दूधिया आँचल में समा जाते हैं।
उत्तर : कहानीकार का यह कथन सिख बीबी के बारे में है। लाहौर की याद में सिख बीबी इतनी भावुक हो जाती हैं कि उनकी आँखों से आँसू निकलकर उनके सफ़ेद मलमल के दुपट्टे पर टपकने लगते हैं। यहां उपमाओं की मदद से कहानी में सौंदर्य उत्पन्न किया गया है।
2. किसका वतन कहाँ है- वह जो कस्टम के इस तरफ़ है या उस तरफ़।
उत्तर : भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद कुछ लोगों की स्थिति ऐसी हो गयी है कि वे भारत में पैदा हुए पर वतन कहलाया पाकिस्तान। जो पाकिस्तान में पैदा हुए उनका वतन हो गया भारत। तो असली वतन किसे कहा जाये, जो कस्टम के इस तरफ है उसे या जो कस्टम के उस तरफ है, उसे?
यही कहानी का सवाल है, जो हमसे किया गया है। भारत-पाकिस्तान के राजनीतिक आकाओं से किया गया है। इंसानियत से किया गया है। ऽ पाठ के आसपास
प्रश्न : 1 : ‘नमक’ कहानी में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में रहने वाले लोगों की भावनाओं, संवेदनाओं को उभारा गया है। वर्तमान संदर्भ में इन संवेदनाओं की स्थिति को तर्क सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : ‘नमक’ कहानी में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में रहने वाले लोगों की भावनाओं, संवेदनाओं को उभारा गया है। आज के संदर्भ में स्थिति में काफी परिवर्तन हो चुका है विभाजन के समय वाली पीढ़ी अब समाप्त हो चुकी है। उसका स्थान उस पीढ़ी ने ले लिया है, जिसका जन्म इसी देश में हुआ है। उनके पास विभाजन की कड़वी यादें न के बराबर हैं।
दोनों देषों की जनता आपस में मधुर संबंध रखना चाहती है। पर राजनीतिक लोग अपने स्वार्थ के लिये दोनों देषों के
बीच में तनाव बढ़ाते रहते हैं। आपसी संबंधों में मधुरता लाने के प्रयास किए जाने चाहिए। विश्व बंधुत्व वाली संस्कृति का यही उद्देश्य है।
प्रश्न : 2 : सफ़िया की मनःस्थिति को कहानी में एक विशिष्ट संदर्भ में अलग तरह से स्पष्ट किया गया है। अगर आप सफ़िया की जगह होते/होतीं तो क्या आपकी मनःस्थिति भी वैसी ही होती? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः- उस विशिष्अ संदर्भ में सफ़िया और मेरी मनःस्थिति में कोई अंतर नहीं होता। मैं भी उपकी तरह ही सीधे और सच्चे तरीके से अपनी भावनाएँ व्यक्त कर देता और सफ़िया की तरह ही मैं भी लाहौरी नमक लाने का पूरा प्रयास करता।
प्रश्न : 3 : भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने के लिए दोनों सरकारें प्रयासरत हैं। व्यक्तिगत तौर पर आप इसमें क्या योगदान दे सकते/सकती हैं?
उत्तर : भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने के लिए व्यक्तिगत तौर पर मैं इस तरह के प्रयास करना चाहूंगा –
1. दोनों देशों के ऐसे लोगों का एक मैत्री संगठन बनाउंगा, जो संबंध सुधारने के इच्छुक हैं।
2. दोनों देशों के कलाकारों, लेखकों, विचारकों, खिलाड़ियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आना-जाना शुरु हो
सके, ऐसे प्रयास करूंगा।
3. दोनों देशों के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, किताबों, फिल्मों का आदान-प्रदान सहज बनाने में योगदान करूंगा।
4. सूचना क्रांति के इस युग में इंटरनेट का प्रयोग कर पाकिस्तान में अपने दोस्तों का दायरा बढ़ाने का प्रयास करूँगा।
प््राश्न : 4 : लेखिका ने विभाजन से उपजी विस्थापन की समस्या का चित्रण करते हुए सफ़िया व सिख बीबी के माध्यम से यह भी परोक्ष रूप से संकेत किया है कि इसमें भी विवाह की रीति के कारण स्त्री सबसे अधिक विस्थापित है। क्या आप इससे सहमत हैं?
उत्तर : हां, हम सहमत हैं। विवाह के कारण स्त्रियों को वैसे ही पहले तो अपने माता-पिता के घर से विस्थापित होना पड़ता है। फिर अगर देश विभाजन की स्थिति आये तो उन्हें अपने पति के साथ दोबारा विस्थापित होना पड़ता है।
प्रश्न : 5 : विभाजन के अनेक स्वरूपों में बँटी जनता को मिलाने की अनेक भूमियाँ हो सकती हैं- रक्त संबंध, विज्ञान, साहित्य व कला। इनमें से कौन सबसे ताकतवर है और क्यों?
उत्तर : विभाजन के अनेक स्वरूपों में बँटी जनता को मिलाने की अनेक भूमियाँ हो सकती हैं- रक्त संबंध, विज्ञान, साहित्य व कला। इनमें से सबसे ताकतवर भूमि है साहित्य व कला। साहित्यकार और कलाकार देश, धर्म, जाति, भाषा आदि के दायरे से ऊपर उठकर पूरी मानवता के बारे में सोचते हैं। कला और साहित्य भेद के दायरों को तोड़कर एक नया विश्व रचते हैं।
ऽ आपकी राय
प््राश्न : 1 : मान लीजिए आप अपने मित्र के पास विदेश जा रहे/रही हैं। आप सौगात के तौर पर भारत की कौन-सी चीज़ ले जाना पसंद करेंगे/करेंगी और क्यों?
उत्तर : सौगात के तौर पर मैं अपने मित्र के लिए यहाँ की कुछ प्रसिद्ध किताबें, कलाकृतियां, फोटोग्राफ्स, हस्तशिल्प की वस्तुएं आदि ले जाना पसंद करूँगा। इन के जरिए भारत की महान् संस्कृति से उसे परिचित करवाना चाहूँगा। ऽ भाषा की बात
प््राश्न : 1. नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यान से पढ़िए-
(क) हमारा वतन तो जी लाहौर ही है।
(ख) क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं?
सामान्यतः ‘ही‘ निपात का प्रयोग किसी बात पर बल देने के लिए किया जाता है। ऊपर दिए गए दोनों वाक्यों में ‘ही‘ के प्रयोग से अर्थ में क्या परिवर्तन आया है? स्पष्ट कीजिए। ‘ही‘ का प्रयोग करते हुए दोनों तरह के अर्थ वाले पाँच-पाँच वाक्य बनाइए।
वाक्य :
1. मुझे तो कहानी ही पढ़नी है।
2. मुझे मैच देखने ही जाना है
3. घर तो आपका ही अच्छा है।
4. उसका बगीचा बेकार सा ही है।
5.किताब तो आपकी ही है।
दूसरी तरह के वाक्य
1. क्या सब सुझाव आपके ही चलेंगे?
2. क्या सारा धन आज ही दे देंगे?
3.क्या आप मुझे घर से निकाल ही देंगे?
4. क्या सिनेमा मात्र लड़के ही देखते हैं?
5. क्या वे सिर्फ़ पारिवारिक विषयों पर ही लिखते हैं?
प््राश्न : 2 : नीचे दिए गए शब्दों के हिन्दी रूप लिखिए –
मुरौवत, आदमियत, अदीब, साडा, मायने, सरहद, अक्स, लबोलहजा, नफीस
शब्द हिन्दी रूप
मुरौवत संकोच
आदमियत इंसानियत
अदीब साहित्यकार
साडा हमारा
मायने अर्थ
सरहद सीमा
अक्स आकार
लबोलहजा बोलने का ढंग
नफीस सुरुचिपूर्ण
प्रश्न : 3 : पंद्रह दिन यों गुज़रे कि पता ही नहीं चला-वाक्य को ध्यान से पढ़िए और इसी प्रकार के (यों, कि, ही से युक्त पाँच वाक्य बनाइए।)
उत्तर : 1. घूमने के लिये ही घर से निकले ही थे कि पानी बरसने जगा।
2. सोया ही था, कि घंटी बनजे लगी।
3. साल ऐसे ही निकल गया कि पता ही न चला।
4. मालिक ने यों ही कह दिया कि वेतन बढ़ा देंगे।
5. बचपन यूं ही बीत गया कि पता ही न चला।
तो यह था रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी ‘नमक’ के प्रश्नोत्तरों वाला हिस्सा।
अगली बार हम रज़िया सज्जाद ज़हीर का जीवन वरिचय जानेंगे।

प्रत्यय हिंदी व्याकरण दीपेश कुमार जैन जवाहर नवोदय विद्यालय वारासिवनी मध्यप्रदेश


प्रत्यय (suffix) उन शब्दों को कहते हैं जो किसी अन्य शब्द के अन्त में लगाये जाते हैं। इनके लगाने से शब्द के अर्थ में भिन्नता या वैशिष्ट्य आ जाता है। उदाहरण

वान
यह किसी व्यक्ति की विशेषता दर्शाते समय उपयोग होता है। जैसे यह पहलवान बहुत बलवान है।
   धन + वान = धनवान
   विद्या + वान = विद्वान
   बल + वान = बलवान
ता
   उदार + ता = उदारता
   सफल + ता = सफलता
   पण्डित + ई = पण्डिताई
   चालाक + ई = चालाकी
   ज्ञान + ई - ज्ञानी
ओं
इसका उपयोग एक वचन शब्दों को बहुवचन शब्द बनाने के लिए किया जाता है।
   भाषा + ओं = भाषाओं
   शब्द + ओं = शब्दों
   वाक्य + ओं = वाक्यों
   कार्य + ओं = कार्यों
याँ
   नदी + याँ = नदियाँ
   प्रति + याँ = प्रतियाँ
  • अक लेख्, पाठ्, कृ, गै लेखक, पाठक, कारक, गायक
  • अन पाल्, सह्, ने, चर् पालन, सहन, नयन, चरण
  • अना घट्, तुल्, वंद्, विद् घटना, तुलना, वन्दना, वेदना
  • अनीय मान्, रम्, दृश्, पूज्, श्रु माननीय, रमणीय, दर्शनीय, पूजनीय, श्रवणीय
  •  सूख, भूल, जाग, पूज, इष्, भिक्ष् सूखा, भूला, जागा, पूजा, इच्छा, भिक्षा
  • आई लड़, सिल, पढ़, चढ़ लड़ाई, सिलाई, पढ़ाई, चढ़ाई
  • आन उड़, मिल, दौड़ उड़ान, मिलान, दौड़ान
  •  हर, गिर, दशरथ, माला हरि, गिरि, दाशरथि, माली
  • इया छल, जड़, बढ़, घट छलिया, जड़िया, बढ़िया, घटिया
  • इत पठ, व्यथा, फल, पुष्प पठित, व्यथित, फलित, पुष्पित
  • इत्र चर्, पो, खन् चरित्र, पवित्र, खनित्र
  • इयल अड़, मर, सड़ अड़ियल, मरियल, सड़ियल
  •  हँस, बोल, त्यज्, रेत हँसी, बोली, त्यागी, रेती
  • उक इच्छ्, भिक्ष् इच्छुक, भिक्षुक
  • तव्य कृ, वच् कर्तव्य, वक्तव्य
  • ता आ, जा, बह, मर, गा आता, जाता, बहता, मरता, गाता
  • ति अ, प्री, शक्, भज अति, प्रीति, शक्ति, भक्ति
  • ते जा, खा जाते, खाते
  • त्र अन्य, सर्व, अस् अन्यत्र, सर्वत्र, अस्त्र
  •  क्रंद, वंद, मंद, खिद्, बेल, ले क्रंदन, वंदन, मंदन, खिन्न, बेलन, लेन
  • ना पढ़, लिख, बेल, गा पढ़ना, लिखना, बेलना, गाना
  •  दा, धा दाम, धाम
  •  गद्, पद्, कृ, पंडित, पश्चात्, दंत्, ओष्ठ् गद्य, पद्य, कृत्य, पाण्डित्य, पाश्चात्य, दंत्य, ओष्ठ्य
  • या मृग, विद् मृगया, विद्या
  • वाला देना, आना, पढ़ना देनेवाला, आनेवाला, पढ़नेवाला
  • हार होना, रखना, खेवना होनहार, रखनहार, खेवनहार

लिंग व्याकरण हिंदी दीपेश कुमार जैन जवाहर नवोदय विद्यालय वारासिवनी मध्यप्रदेश

लिंग(gender) की परिभाषा

"संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की नर या मादा जाति का बोध हो, उसे व्याकरण में 'लिंग' कहते है।
दूसरे शब्दों में-संज्ञा शब्दों के जिस रूप से उसके पुरुष या स्त्री जाति होने का पता चलता है, उसे लिंग कहते है।
सरल शब्दों में- शब्द की जाति को 'लिंग' कहते है।
जैसे-
पुरुष जाति- बैल, बकरा, मोर, मोहन, लड़का आदि।
स्त्री जाति- गाय, बकरी, मोरनी, मोहिनी, लड़की आदि।
'लिंग' संस्कृत भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'चिह्न' या 'निशान'। चिह्न या निशान किसी संज्ञा का ही होता है। 'संज्ञा' किसी वस्तु के नाम को कहते है और वस्तु या तो पुरुषजाति की होगी या स्त्रीजाति की। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक संज्ञा पुंलिंग होगी या स्त्रीलिंग। संज्ञा के भी दो रूप हैं। एक, अप्रणिवाचक संज्ञा- लोटा, प्याली, पेड़, पत्ता इत्यादि और दूसरा, प्राणिवाचक संज्ञा- घोड़ा-घोड़ी, माता-पिता, लड़का-लड़की इत्यादि।

लिंग के भेद

सारी सृष्टि की तीन मुख्य जातियाँ हैं- (1) पुरुष (2) स्त्री और (3) जड़। अनेक भाषाओं में इन्हीं तीन जातियों के आधार पर लिंग के तीन भेद किये गये हैं- (1) पुंलिंग (2) स्त्रीलिंग और (3) नपुंसकलिंग।
अँगरेजी व्याकरण में लिंग का निर्णय इसी व्यवस्था के अनुसार होता है। मराठी, गुजराती आदि आधुनिक आर्यभाषाओं में भी यह व्यवस्था ज्यों-की-त्यों चली आ रही है।
इसके विपरीत, हिन्दी में दो ही लिंग- पुंलिंग और स्त्रीलिंग- हैं। नपुंसकलिंग यहाँ नहीं हैं। अतः, हिन्दी में सारे पदार्थवाचक शब्द, चाहे वे चेतन हों या जड़, स्त्रीलिंग और पुंलिंग, इन दो लिंगों में विभक्त है।
हिन्दी व्याकरण में लिंग के दो भेद होते है-
(1)पुलिंग(Masculine Gender)
(2)स्त्रीलिंग( Feminine Gender)
(1) पुलिंग :- जिन संज्ञा शब्दों से पुरूष जाति का बोध होता है, उसे पुलिंग कहते है।
जैसे-
सजीव- कुत्ता, बालक, खटमल, पिता, राजा, घोड़ा, बन्दर, हंस, बकरा, लड़का इत्यादि।
निर्जीव पदार्थ- मकान, फूल, नाटक, लोहा, चश्मा इत्यादि।
भाव- दुःख, लगाव, इत्यादि।
(2)स्त्रीलिंग :- जिस संज्ञा शब्द से स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते है।
जैसे-
सजीव- माता, रानी, घोड़ी, कुतिया, बंदरिया, हंसिनी, लड़की, बकरी,जूँ।
निर्जीव पदार्थ- सूई, कुर्सी, गर्दन इत्यादि।
भाव- लज्जा, बनावट इत्यादि।

पुल्लिंग की पहचान

(1) कुछ संज्ञाएँ हमेशा पुल्लिंग रहती है-
खटमल, भेड़या, खरगोश, चीता, मच्छर, पक्षी, आदि।
(2)समूहवाचक संज्ञा- मण्डल, समाज, दल, समूह, वर्ग आदि।
(3) भारी और बेडौल वस्तुअों- जूता, रस्सा, लोटा ,पहाड़ आदि।
(4) दिनों के नाम- सोमवार, मंगलवार, बुधवार, वीरवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार आदि।
(5) महीनो के नाम- फरवरी, मार्च, चैत, वैशाख आदि। (अपवाद- जनवरी, मई, जुलाई-स्त्रीलिंग)
(6) पर्वतों के नाम- हिमालय, विन्द्याचल, सतपुड़ा, आल्प्स, यूराल, कंचनजंगा, एवरेस्ट, फूजीयामा आदि।
(7) देशों के नाम- भारत, चीन, इरान, अमेरिका आदि।
(8) नक्षत्रों, व ग्रहों के नाम- सूर्य, चन्द्र, राहू, शनि, आकाश, बृहस्पति, बुध आदि।
(अपवाद- पृथ्वी-स्त्रीलिंग)
(9) धातुओं- सोना, तांबा, पीतल, लोहा, आदि।
(10) वृक्षों, फलो के नाम- अमरुद, केला, शीशम, पीपल, देवदार, चिनार, बरगद, अशोक, पलाश, आम आदि।
(11) अनाजों के नाम- गेहूँ, बाजरा, चना, जौ आदि। (अपवाद- मक्की, ज्वार, अरहर, मूँग-स्त्रीलिंग)
(12) रत्नों के नाम- नीलम, पुखराज, मूँगा, माणिक्य, पन्ना, मोती, हीरा आदि।
(13) फूलों के नाम- गेंदा, मोतिया, कमल, गुलाब आदि।
(14) देशों और नगरों के नाम- दिल्ली, लन्दन, चीन, रूस, भारत आदि।
(15) द्रव पदार्थो के नाम- शरबत, दही, दूध, पानी, तेल, कोयला, पेट्रोल, घी आदि।
(अपवाद- चाय, कॉफी, लस्सी, चटनी- स्त्रीलिंग)
(16) समय- घंटा, पल, क्षण, मिनट, सेकेंड आदि।
(17) द्वीप- अंडमान-निकोबार, जावा, क्यूबा, न्यू फाउंडलैंड आदि।
(18) सागर- हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, अरब सागर आदि।
(19) वर्णमाला के अक्षर- क्, ख्, ग्, घ्, त्, थ्, अ, आ, उ, ऊ आदि। (अपवाद- इ, ई, ऋ- स्त्रीलिंग)
(20) शरीर के अंग- हाथ, पैर, गला, अँगूठा, कान, सिर, मस्तक, मुँह, घुटना, ह्रदय, दाँत आदि।
(अपवाद- जीभ, आँख, नाक, उँगलियाँ-स्त्रीलिंग)
(21) आकारान्त संज्ञायें- गुस्सा, चश्मा, पैसा, छाता आदि।
(22) 'दान, खाना, वाला' आदि से अंत होने वाले अधिकतर शब्द पुल्लिंग होते हैं; जैसे- खानदान, पीकदान, दवाखाना, जेलखाना, दूधवाला आदि।
(23) अ, आ, आव, पा, पन, क, त्व, आवा तथा औड़ा से अंत होने वाली संज्ञाएँ पुल्लिंग होती हैं :
अ- खेल, रेल, बाग, हार, यंत्र आदि।
आ- लोटा, मोटा, गोटा, घोड़ा, हीरा आदि।
आव- पुलाव, दुराव, बहाव, फैलाव, झुकाव आदि।
पा- बुढ़ापा, मोटापा, पुजापा आदि।
पन- लड़कपन, अपनापन, बचपन, सीधापन आदि।
क- लेखक, गायक, बालक, नायक आदि।
त्व- ममत्व, पुरुषत्व, स्त्रीत्व, मनुष्यत्व आदि।
आवा- भुलावा, छलावा, दिखावा, चढ़ावा आदि।
औड़ा- पकौड़ा, हथौड़ा आदि।
(24) मच्छर, गैंडा, कौआ, भालू, तोता, गीदड़, जिराफ, खरगोश, जेबरा आदि सदैव पुल्लिंग होते हैं।
(25) कुछ प्राणिवाचक शब्द, जो सदैव पुरुष जाति का बोध कराते हैं; जैसे- बालक, गीदड़, कौआ, कवि, साधु आदि।

स्त्रीलिंग की पहचान

(1) स्त्रीलिंग शब्दों के अंतर्गत नक्षत्र, नदी, बोली, भाषा, तिथि, भोजन आदि के नाम आते हैं; जैसे-
(i) कुछ संज्ञाएँ हमेशा स्त्रीलिंग रहती है- मक्खी ,कोयल, मछली, तितली, मैना आदि।
(ii) समूहवाचक संज्ञायें- भीड़, कमेटी, सेना, सभा, कक्षा आदि।
(iii) प्राणिवाचक संज्ञा- धाय, सन्तान, सौतन आदि।
(iv) छोटी और सुन्दर वस्तुअों के नाम- जूती, रस्सी, लुटिया, पहाड़ी आदि।
(v) नक्षत्र- अश्विनी, रेवती, मृगशिरा, चित्रा, भरणी, रोहिणी आदि।
(vi) बोली- मेवाती, ब्रज, खड़ी बोली, बुंदेली आदि।
(vii) नदियों के नाम- रावी, कावेरी, कृष्णा, यमुना, सतलुज, रावी, व्यास, गोदावरी, झेलम, गंगा आदि।
(viii) भाषाओं व लिपियों के नाम- देवनागरी, अंग्रेजी, हिंदी, फ्रांसीसी, अरबी, फारसी, जर्मन, बंगाली आदि।
(ix) पुस्तकों के नाम- कुरान, रामायण, गीता आदि।
(x) तिथियों के नाम- पूर्णिमा, अमावस्था, एकादशी, चतुर्थी, प्रथमा आदि।
(xi) आहारों के नाम- सब्जी, दाल, कचौरी, पूरी, रोटी आदि।
अपवाद- हलुआ, अचार, रायता आदि।
(xii) ईकारान्त वाले शब्द- नानी, बेटी, मामी, भाभी आदि।
नोट- हिन्दी भाषा में वाक्य रचना में क्रिया का रूप लिंग पर ही निर्भर करता है। यदि कर्ता पुल्लिंग है तो क्रिया रूप भी पुल्लिंग होता है तथा यदि कर्ता स्त्रीलिंग है तो क्रिया का रूप भी स्त्रीलिंग होता है।

(2) आ, ता, आई, आवट, इया, आहट आदि प्रत्यय लगाकर भी स्त्रीलिंग शब्द बनते हैं; जैसे-
आ- भाषा, कविता, प्रजा, दया, विद्या आदि।
ता- गीता, ममता, लता, संगीता, माता, सुंदरता, मधुरता आदि।
आई- सगाई, मिठाई, धुनाई, पिटाई, धुलाई आदि।
आवट- सजावट, बनावट, लिखावट, थकावट आदि।
इया- कुटिया, बुढ़िया, चिड़िया, बिंदिया, डिबिया आदि।
आहट- चिल्लाहट, घबराहट, चिकनाहट, कड़वाहट आदि।
या- छाया, माया, काया आदि।
आस- खटास, मिठास, प्यास आदि
(3) शरीर के कुछ अंगों के नाम भी स्त्रीलिंग होते हैं; जैसे-
आँख, नाक, जीभ, पलकें, ठोड़ी आदि।
(4) कुछ आभूषण और परिधान भी स्त्रीलिंग होते है; जैसे-
साड़ी, सलवार, चुन्नी, धोती, टोपी, पैंट, कमीज, पगड़ी, माला, चूड़ी, बिंदी, कंघी, नथ, अँगूठी, हँसुली आदि।
(5) कुछ मसाले आदि भी स्त्रीलिंग के अंतर्गत आते हैं; जैसे-
दालचीनी, लौंग, हल्दी, मिर्च, धनिया, इलायची, अजवायन, सौंफ, चिरौंजी, चीनी, कलौंजी, चाय, कॉफी आदि।
विशेष :
कुछ शब्द ऐसे हैं, जो स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों रूपों में प्रयोग किए जाते है; जैसे-
(1) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, चित्रकार, पत्रकार, प्रबंधक, सभापति, वकील, डॉक्टर, सेक्रेटरी, गवर्नर, लेक्चर, प्रोफेसर आदि।
(2) बर्फ, मेहमान, शिशु, दोस्त, मित्र आदि।
इन शब्दों के लिंग का परिचय योजक-चिह्न, क्रिया अथवा विशेषण से मिलता है।
यहाँ हम देखें, कैसे इस तरह के शब्दों के लिंग को पहचाना जा सकता है :
(i) भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल हैं।
(ii) एम० एफ० हुसैन भारत के प्रसिद्ध चित्रकार हैं।
(iii) मेरी मित्र कॉलेज में लेक्चरर है।
(iv) हिमालय पर जमी बर्फ पिघल रही हैं।
(v) दुख में साथ देने वाला ही सच्चा दोस्त कहलाता है।
(vi) मेरे पिताजी राष्ट्रपति के सेक्रेटरी हैं।

लिंग-निर्णय

तत्सम (संस्कृत) शब्दों का लिंग-निर्णय

संस्कृत पुंलिंग शब्द
पं० कामताप्रसाद गुरु ने संस्कृत शब्दों को पहचानने के निम्नलिखित नियम बताये है-
(अ) जिन संज्ञाओं के अन्त में 'त्र' होता है। जैसे- चित्र, क्षेत्र, पात्र, नेत्र, चरित्र, शस्त्र इत्यादि।
(आ) 'नान्त' संज्ञाएँ। जैसे- पालन, पोषण, दमन, वचन, नयन, गमन, हरण इत्यादि।
अपवाद- 'पवन' उभयलिंग है।
(इ) 'ज'-प्रत्ययान्त संज्ञाएँ। जैसे- जलज,स्वेदज, पिण्डज, सरोज इत्यादि।
(ई) जिन भाववाचक संज्ञाओं के अन्त में त्व, त्य, व, य होता है। जैसे- सतीत्व, बहूत्व, नृत्य,
कृत्य, लाघव, गौरव, माधुर्य इत्यादि।
(उ) जिन शब्दों के अन्त में 'आर', 'आय', 'वा', 'आस' हो। जैसे- विकार, विस्तार, संसार, अध्याय, उपाय,
समुदाय, उल्लास, विकास, ह्रास इत्यादि।
अपवाद- सहाय (उभयलिंग), आय (स्त्रीलिंग)।
(ऊ) 'अ'-प्रत्ययान्त संज्ञाएँ। जैसे- क्रोध, मोह, पाक, त्याग, दोष, स्पर्श इत्यादि।
अपवाद- जय (स्त्रीलिंग), विनय (उभयलिंग) आदि।
(ऋ) 'त'-प्रत्ययान्त संज्ञाएँ। जैसे- चरित, गणित, फलित, मत, गीत, स्वागत इत्यादि।
(ए) जिनके अन्त में 'ख' होता है। जैसे- नख, मुख, सुख, दुःख, लेख, मख, शख इत्यादि।
संस्कृत स्त्रीलिंग शब्द
पं० कामताप्रसाद गुरु ने संस्कृत स्त्रीलिंग शब्दों को पहचानने के निम्नलिखित नियम बताये है-
(अ) आकारान्त संज्ञाएँ। जैसे- दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा इत्यादि।
(आ) नाकारान्त संज्ञाएँ। जैसे- प्रार्थना, वेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना इत्यादि।
(इ) उकारान्त संज्ञाएँ। जैसे- वायु, रेणु, रज्जु, जानु, मृत्यु, आयु, वस्तु, धातु इत्यादि।
अपवाद- मधु, अश्रु, तालु, मेरु, हेतु, सेतु इत्यादि।
(ई) जिनके अन्त में 'ति' वा 'नि' हो। जैसे- गति, मति, रीति, हानि, ग्लानि, योनि, बुद्धि,
ऋद्धि, सिद्धि (सिध् +ति=सिद्धि) इत्यादि।
(उ) 'ता'-प्रत्ययान्त भाववाचक संज्ञाएँ। जैसे- न्रमता, लघुता, सुन्दरता, प्रभुता, जड़ता इत्यादि।
(ऊ) इकारान्त संज्ञाएँ। जैसे- निधि, विधि, परिधि, राशि, अग्नि, छवि, केलि, रूचि इत्यादि।
अपवाद- वारि, जलधि, पाणि, गिरि, अद्रि, आदि, बलि इत्यादि।
(ऋ) 'इमा'- प्रत्ययान्त शब्द। जैसे- महिमा, गरिमा, कालिमा, लालिमा इत्यादि।

तत्सम पुंलिंग शब्द

चित्र, पत्र, पात्र, मित्र, गोत्र, दमन, गमन, गगन, श्रवण, पोषण, शोषण, पालन, लालन, मलयज, जलज, उरोज, सतीत्व, कृत्य, लाघव, वीर्य, माधुर्य, कार्य, कर्म, प्रकार, प्रहार, विहार, प्रचार, सार, विस्तार, प्रसार, अध्याय, स्वाध्याय, उपहार, ह्रास, मास, लोभ, क्रोध, बोध, मोद, ग्रन्थ, नख, मुख, शिख, दुःख, सुख, शंख, तुषार, तुहिन, उत्तर, पश्र, मस्तक, आश्र्चर्य, नृत्य, काष्ट, छत्र, मेघ, कष्ट, प्रहर, सौभाग्य, अंकन, अंकुश, अंजन, अंचल, अन्तर्धान, अन्तस्तल, अम्बुज, अंश, अकाल, अक्षर, कल्याण, कवच, कायाकल्प, कलश, काव्य, कास, गज, गण, ग्राम, गृह, चन्द्र, चन्दन, क्षण, छन्द, अलंकार, सरोवर, परिमाण, परिमार्जन, संस्करण, संशोधन, परिवर्तन, परिशोध, परिशीलन, प्राणदान,
वचन, मर्म, यवन, रविवार, सोमवार, मार्ग, राजयोग, रूप, रूपक, स्वदेश, राष्ट, प्रान्त, नगर, देश, सर्प, सागर, साधन, सार, तत्त्व, स्वर्ग, दण्ड, दोष, धन, नियम, पक्ष, पृष्ट, विधेयक, विनिमय, विनियोग, विभाग, विभाजन, विऱोध, विवाद, वाणिज्य, शासन, प्रवेश, अनुच्छेद, शिविर, वाद, अवमान, अनुमान, आकलन, निमन्त्रण, नियंत्रण, आमंत्रण,उद्भव, निबन्ध, नाटक, स्वास्थ्य, निगम, न्याय, समाज, विघटन, विसर्जन, विवाह, व्याख्यान, धर्म, उपकरण, आक्रमण, श्रम,बहुमत, निर्माण, सन्देश, ज्ञापक, आभार, आवास, छात्रावास, अपराध, प्रभाव, लोक, विराम, विक्रम, न्याय, संघ, संकल्प इत्यादि।

तत्सम स्त्रीलिंग शब्द

दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा, सभा, प्रार्थना, वेदना, समवेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना, अवस्था, नम्रता, सुन्दरता, प्रभुता, जड़ता, महिमा, गरिमा, कालिमा, लालिमा, ईष्र्या, भाषा, अभिलाषा, आशा, निराशा, पूर्णिमा, अरुणिमा, काया, कला, चपला, इच्छा, अनुज्ञा, आज्ञा, आराधना, उपासना, याचना, रक्षा, संहिता, आजीविका, घोषणा, परीक्षा, गवेषणा, नगरपालिका, नागरिकता, योग्यता, सीमा, स्थापना, संस्था, सहायता,मान्यता, व्याख्या, शिक्षा, समता, सम्पदा, संविदा, सूचना, सेवा, सेना, विज्ञप्ति, अनुमति, अभियुक्ति, अभिव्यक्ति, उपलब्धि, विधि, क्षति,
पूर्ति, विकृति, जाति, निधि, सिद्धि, समिति, नियुक्ति, निवृत्ति, रीति, शक्ति, प्रतिकृति, कृति, प्रतिभूति, प्रतिलिपि, अनुभूति, युक्ति, धृति, हानि, स्थिति, परिस्थिति, विमति, वृत्ति, आवृत्ति, शान्ति, सन्धि, समिति, सम्पत्ति, सुसंगति, कटि, छवि, रुचि, अग्नि, केलि, नदी, नारी, मण्डली, लक्ष्मी, शताब्दी, श्री, कुण्डली, कुण्डलिनी, कौमुदी, गोष्ठी, धात्री, मृत्यु, आयु, वस्तु, रज्जु, रेणु, वायु इत्यादि।

चित्र

कविता 34 ज़िन्दगी एक एहसास है

जिंदगी एक अहसास है ' अभिलाषाओ का पापा  कही कम कही ज्यादा प्यासों का  वो मगर क्या सोचता है समझ नहीं आता परिंदों और हवाओ को कैद करने...