स्वरचित कविताओं/विचारो/लेखों/ज्ञानवर्धक संग्रह/कहानियां **न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।* *कामये दुःखतप्तानां प्रणिनां आर्तिनाशनम् ॥*
Friday, October 26, 2018
Friday, October 19, 2018
कविता 55 रिश्ते भी क्या चीज़ है पापा
रिश्ते भी क्या चीज़ है पापा
कहना करना ,करना कहना
सुनना सुनाना,सुनाना सुनना,
रिश्ते भी हैं अजीब चीज़
कभी निभना ,कभी निभाना
रिश्ते क्या चीज़ है पापा
हँसना हँसाना, हँसते हँसते पेट दुखाना
रोना रुलाना,रुलाकर खुद रोना
रूठना मनाना,मनाकर खुद रूठना
फिर भी घुलमिल एक हो जाना
रिश्ते भी क्या चीज़ है पापा
जोड़ बेजोड़ बन जाता है गर
चाँद तारे भी लाता है जिगर
कहावतें बनती है तब जमी पर
मेरा चाँद मुझे आया है नज़र
रिश्ते भी क्या चीज़ है पापा
दोस्त बनकर आना, जान बन जाना
सुख दुख जीवन भर बटबाना
कड़वे मीठे घूट जीवन पथ पर पाना
गाथा जीवन की गठरी बन उठवाना
रिश्ते भी क्या चीज़ है पापा
माँ बाप के कंधो पर बैठना
माँ बाप को कंधो पर ले जाना
भाई बहन बनकर खिलखिलाना
बहन भाई का जुदा हो जाना
रिश्ते भी क्या चीज़ है पापा
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Thursday, October 18, 2018
कविता 47 दशहरा स्पेशल
जो दस चेहरों को एक बनायेगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
जो कर्तव्य मार्ग पर बढ़ते जायेगे,
रात दिन तो पहिया है समय का,
जिंदगी की उलझनो को जो सुलझाएंगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
इर्ष्या ,देष ,घमंड से जो दूर हो जायेगे
प्रेम ,रीति,नीति ,सदाचार ही है सच्चा ज्ञान
करना है उपकार सभी पे ये ले तू ठान
जो इन बातो को समझ जायेगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
जीवन है तो यू ही हँसते हँसते है जीना
नव उदय हुआ है नव चिंतन का महीना
मानवता इंसानियत के गुण जिनमे आएंगे
जो दशरथ पुत्र राम की परम्परा निभाएंगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
दीपेश कुमार जैन
वो ही दशहरा मनाएंगे
जो कर्तव्य मार्ग पर बढ़ते जायेगे,
रात दिन तो पहिया है समय का,
जिंदगी की उलझनो को जो सुलझाएंगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
इर्ष्या ,देष ,घमंड से जो दूर हो जायेगे
प्रेम ,रीति,नीति ,सदाचार ही है सच्चा ज्ञान
करना है उपकार सभी पे ये ले तू ठान
जो इन बातो को समझ जायेगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
जीवन है तो यू ही हँसते हँसते है जीना
नव उदय हुआ है नव चिंतन का महीना
मानवता इंसानियत के गुण जिनमे आएंगे
जो दशरथ पुत्र राम की परम्परा निभाएंगे
वो ही दशहरा मनाएंगे
दीपेश कुमार जैन
Monday, October 15, 2018
कविता 46 दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
दर्द देकर दुनिया लेती है मजे पाखंडीयों के घर फूलो से सजे
कभी धूप कभी छाँव के धोके यहाँ इसलिए मानवता शर्मसार बैठी लजे
दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
खुद का नही यहाँ नजरिया कोई
दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
खुद का नही यहाँ नजरिया कोई
हर किसी का व्यक्तित्व कोई और रचे
कम को ज्यादा,ज्यादा को कम
हर कोई मजबूर हो झूठी कथा रचे दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
सच झूठ का फैसला क्या कभी हो पाया
खुद की समझ ही नही ,तभी तो गैरो ने समझाया
झूठी बिसात की इबारत लंबी नही होती
कहा है बुजर्गो ने सच की कभी हार नही होती
दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
हर कोशिशें दागदार बनाने की तुम्हे
कुछ तो होना ही है गर कोई कुछ कहे
आसमान छूने के लिए कबिलियत चाहये दीपेश
क्या फर्क पड़ता है कोई छुए ,न छुए
दर्द देकर दुनिया लेती है, मजे
दीपेश कुमार जैन
कम को ज्यादा,ज्यादा को कम
हर कोई मजबूर हो झूठी कथा रचे दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
सच झूठ का फैसला क्या कभी हो पाया
खुद की समझ ही नही ,तभी तो गैरो ने समझाया
झूठी बिसात की इबारत लंबी नही होती
कहा है बुजर्गो ने सच की कभी हार नही होती
दर्द देकर दुनिया लेती है मजे
हर कोशिशें दागदार बनाने की तुम्हे
कुछ तो होना ही है गर कोई कुछ कहे
आसमान छूने के लिए कबिलियत चाहये दीपेश
क्या फर्क पड़ता है कोई छुए ,न छुए
दर्द देकर दुनिया लेती है, मजे
दीपेश कुमार जैन
Tuesday, October 9, 2018
दादा दादी की कविता
दादा दादी पहने खादी
बापू जी की याद दिलाते
मेरा देश मेरी शान
ये भी मुझे सिखलाते
अपने हाथो से दादी मुझे नहलाती इसलिये पापा की मम्मी कहलाती दादा मुझको पीठ चढ़ाते
खुद हार के मुझे जिताते
मेरे मुस्कराने से
हँसते जाते
हँसते जाते
हँसते जाते
जय हिन्द
कविता 43 जीवन के रंग बड़े निराले
जीवन के रंग बड़े निराले
किसी को सर छुपाने को घर नहीं
और किसी के बन रहे हैं माले पे माले जीवन के रंग बड़े निराले
वहम पाले है दुनिया अपने अहम का भूल गया सबको मिलता है अपने कर्म का
कुछ दुनियादारी की उलझन मे उलझे कुछ रखते हिसाब इसकी उसकी किसकी सिसकी का
जीवन के रंग बड़े निराले
झूठी सी शान का ये बाजार गया सज आये कुछ गुरुदेव भी यहाँ फहरा गए ध्वज
मंदिर मस्जिद सत्ता के भूखो की बनी तस्वीर घिनोनी
पर थे सच्चे उनमे भी मदन - याकूब साथ गए हज
जीवन के रंग बड़े निराले
हर रोज खुल रहे ईमान की धज्जियो के ताले
नही दिखता बाहर मंदिर के किसी को हैअन्न के लाले
सारा जग खुद में मगरूर हुआ है यहाँ हर शाम कुछ के मजे कुछ के प्याले जीवन के रंग बड़े निराले
किसी को सर छुपाने को घर नहीं
और किसी के बन रहे हैं माले पे माले जीवन के रंग बड़े निराले
वहम पाले है दुनिया अपने अहम का भूल गया सबको मिलता है अपने कर्म का
कुछ दुनियादारी की उलझन मे उलझे कुछ रखते हिसाब इसकी उसकी किसकी सिसकी का
जीवन के रंग बड़े निराले
झूठी सी शान का ये बाजार गया सज आये कुछ गुरुदेव भी यहाँ फहरा गए ध्वज
मंदिर मस्जिद सत्ता के भूखो की बनी तस्वीर घिनोनी
पर थे सच्चे उनमे भी मदन - याकूब साथ गए हज
जीवन के रंग बड़े निराले
हर रोज खुल रहे ईमान की धज्जियो के ताले
नही दिखता बाहर मंदिर के किसी को हैअन्न के लाले
सारा जग खुद में मगरूर हुआ है यहाँ हर शाम कुछ के मजे कुछ के प्याले जीवन के रंग बड़े निराले
Wednesday, October 3, 2018
कविता 42 हद कर दूंगा
उसने इशारा कर दिया ,अब हद कर दूंगा
हर अंधेरी रात को अब रोशन कर दूंगा
मत देख नापाक इरादों से मेरे देश को
वार्ना तेरे घर में ही आकर तुझे दफन कर दूंगा।
अब हद कर दूंगा
सत्ता का ये खेल हमारे घर का है शौक
कई आये ऐसे जो जब मन किया हमने दिया रोक
तेरी तमीज़ का हर कतरा कतरा है हमारा
न पता तुझे कब तेरे सीने में सैलाब बन देंगे तिरंगा ठोक
अब हद कर दूंगा
इंसानियत से बेतहाशा इश्क हम भी करते
पर दरिया मे समंदर नही जाया करते
कोई कह दे उससे तलवार की नोक पर रख हाथ
जिनमे न खुद सुकून हो गैरी को नही सुलाया करते
अब हद कर दूँगा
हर अंधेरी रात को अब रोशन कर दूंगा
मत देख नापाक इरादों से मेरे देश को
वार्ना तेरे घर में ही आकर तुझे दफन कर दूंगा।
अब हद कर दूंगा
सत्ता का ये खेल हमारे घर का है शौक
कई आये ऐसे जो जब मन किया हमने दिया रोक
तेरी तमीज़ का हर कतरा कतरा है हमारा
न पता तुझे कब तेरे सीने में सैलाब बन देंगे तिरंगा ठोक
अब हद कर दूंगा
इंसानियत से बेतहाशा इश्क हम भी करते
पर दरिया मे समंदर नही जाया करते
कोई कह दे उससे तलवार की नोक पर रख हाथ
जिनमे न खुद सुकून हो गैरी को नही सुलाया करते
अब हद कर दूँगा
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कविता 34 ज़िन्दगी एक एहसास है
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